लेकिन 15 -16 जनवरी को असल मामला सामनेआया मामला सामने आते ही (Same-sex marriage) शादी का विषय चर्चा का कारण बन गया।
शादी के बाद जो हुआ उसे सुनकर आप दंग रह जाओगे
शादी के बाद परिवार वालों को जब पता लगा उनकी बेटी ने एक लड़की से शादी की है। घर वालों के होश उड़ गये पता लगने के बाद घर वाले थाने पहुंचते हैं और जबरदस्ती अपनी बेटी को घर लेजाने की कोशिश करते हैं
इसके बाद दोनों पक्षों के बीच थाने में ही तकड़ी बहस हो जाती है। दोनों पक्षों के बीच बड़ा हंगामा देखने को मिलता है पुलिस ने बड़ी मुस्किल से मामले को संभाल मामला गंभीर होता जा रहा था। ज्यादा गंभीर होने से पहले पुलिस ने मामले को संभाल लिया। पुलिस ने दोनों पक्षों को शांत किया और आगे की कार्रवाई की।
पुलिस का पक्ष और कारवाई
पुलिस ने दोनों पक्षों को शांत करने के बाद दोनों ल़डकियों से बातचीत की। बातचीत करने के बाद पुलिस का कहना है दोनों लड़कियां बालिग है अपनी जिंदगी का निर्णय खुद ले सकती है। आप लोग इनके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते। मामले के कानूनी पहलुओं पर उच्च अधिकारियों से विचार किया जा रहा है।
मध्य प्रदेश के छतरपुर में दो सहेलियों की शादी की खबर सामने आते ही यह मामला केवल निजी रिश्ते तक सीमित नहीं रहा। कुछ ही घंटों में यह विषय कानून-व्यवस्था, सामाजिक दबाव और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ गया। ऐसे में पुलिस की भूमिका सिर्फ “देखने वाली संस्था” की नहीं रही, बल्कि स्थिति को संभालने वाली केंद्रीय ताकत के रूप में सामने आई।
शिकायत मिलते ही पुलिस ने स्थिति को गंभीरता से लिया जैसे ही युवती के परिजनों ने थाने पहुंचकर आपत्ति दर्ज कराई, पुलिस ने इसे सामान्य पारिवारिक विवाद मानकर नजर अंदाज नहीं किया। अधिकारियों को अंदेशा था कि मामला भावनात्मक उबाल, जबरदस्ती या हिंसा की ओर बढ़ सकता है। इसी वजह से पुलिस ने शुरुआत से ही इसे संवेदनशील केस मानते हुए हर कदम सोच-समझकर उठाया।
थाने के अंदर क्यों रोकी गईं दोनों युवतियाँ परिजनों के गुस्से और माहौल की गर्मी को देखते हुए पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल था —बाहर भेजें तो खतरा, अंदर रखें तो आरोप। ऐसे में पुलिस ने बीच का रास्ता चुना। दोनों युवतियों को थाने के भीतर सुरक्षित स्थान पर बैठाया गया, ताकि:कोई दबाव न बना सके कोई जबरदस्ती साथ न ले जाए और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में रहे यह कदम सुरक्षा के लिहाज़ से उठाया गया, न कि किसी को रोकने या कैद करने के लिए।
कानून को सामने रखकर लिया गया फैसला पुलिस अधिकारियों ने सबसे पहले उम्र और सहमति की पुष्टि की। जांच में साफ हुआ कि:दोनों बालिग हैं किसी तरह की जबरन शादी या अपहरण का मामला नहीं बनता दोनों अपने फैसले पर स्पष्ट और स्थिर हैं इसके बाद पुलिस ने यह साफ कर दिया कि“कानून किसी बालिग को अपनी मर्जी से जीवन जीने से नहीं रोकता, चाहे समाज कितना भी असहज क्यों न हो।”हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि भारत में ऐसे विवाहों को कानूनी मान्यता नहीं है, लेकिन सिर्फ साथ रहने को अपराध भी नहीं कहा जा सकता।
मानसिक और भावनात्मक स्थिति की अलग-अलग जांचपुलिस ने जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला। दोनों युवतियों से अलग-अलग कमरों में बातचीत की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि: वे किसी भावनात्मक दबाव में नहीं हैं कोई उन्हें बहका या डरा नहीं रहा वे अपने निर्णय को पूरी समझ के साथ ले रही हैं यह प्रक्रिया इसलिए अपनाई गई ताकि बाद में कोई यह आरोप न लगा सके कि पुलिस ने बिना जांच किए मामला निपटा दिया।
संभावित खतरे को देखते हुए सुरक्षा पर फोकस पुलिस को यह अंदेशा था कि अगर युवतियों को तुरंत परिवार के साथ भेज दिया गया, तो उन पर मानसिक या शारीरिक दबाव डाला जा सकता है उनका फैसला बदलवाने की कोशिश हो सकती है या मामला और बिगड़ सकता है इसीलिए पुलिस ने स्थिति पूरी तरह शांत होने तक उन्हें अपनी निगरानी में रखा और किसी भी तरह की जल्दबाजी से बचा।
वरिष्ठ अधिकारियों से लगातार संपर्क थाना स्तर पर अकेले फैसला लेने के बजाय, पुलिस नेवरिष्ठ अधिकारियों से मार्ग दर्शन लिया। कानूनी सलाह और हालात की समीक्षा के बाद यह तय हुआ कि: कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाएगा किसी को भी जबरदस्ती किसी के साथ नहीं भेजा जाएगा दोनों की सुरक्षा और इच्छा को प्राथमिकता दी जाएगी।
पुलिस का स्पष्ट रुख पुलिस ने अपने रुख को साफ शब्दों में रखा यह मामला भावनात्मक और सामाजिक हो सकता है, लेकिन जब तक कानून नहीं टूटता, पुलिस का काम किसी की निजी पसंद पर फैसला सुनाना नहीं है, बल्कि शांति बनाए रखना है। क्यों अहम रही पुलिस की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस ने सामाजिक दबाव में आए बिना काम किया कानून और मानवाधिकार के बीच संतुलन रखा किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय स्थिति को संभाला और यह सुनिश्चित किया कि मामला हिंसा या अराजकता में न बदले यही वजह है कि यह केस सिर्फ दो लोगों की शादी की खबर नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक समझ और कानून के व्यावहारिक इस्तेमाल का उदाहरण बन गया।









