नरवणे की डायरी का खुलासा: चीन बॉर्डर पर असली खेल क्या था?

By Mandeep Rohit

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नरवणे की डायरी का खुलासा चीन बॉर्डर पर असली खेल क्या था

यह कौन हैं ?

जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (MM Naravane) भारतीय सेना के 28वें थल सेनाध्यक्ष (Chief of Army Staff) रहे हैं। उन्होंने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना की कमान संभाली। उनके कार्यकाल के दौरान ही भारत-चीन सीमा पर लद्दाख में 2020 का गंभीर सैन्य टकराव हुआ, जिसे गलवान घाटी घटना के नाम से जाना जाता है।

आर्मी चीफ एम.एम. नरवणे की मेमॉयर में 2020 के चीन सीमा संकट के दौरान लिए गए सैन्य और रणनीतिक फैसलों की अंदरूनी झलक मिलती है। Army Chief Naravane memoir और Army Chief MM Naravane के अनुभव बताते हैं कि लद्दाख में हालात कितने गंभीर थे और सेना ने किस तरह चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में मोर्चा संभाला। MM Naravane memoir उस दौर की अनसुनी सच्चाइयों और जमीनी हालात को सामने लाती है।

इन्होंने क्या किया ?

अपने कार्यकाल के दौरान जनरल नरवणे ने:

  • लद्दाख में चीन के साथ बढ़े तनाव के समय भारतीय सेना की तैनाती और रणनीति का नेतृत्व किया
  • अत्यंत कठिन परिस्थितियों में सैनिकों की तैनाती, रसद (logistics) और रक्षा व्यवस्था को मजबूत किया
  • चीन की आक्रामक गतिविधियों का जवाब देने के लिए जमीन पर सैन्य तैयारी और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा
  • बाद में अपने अनुभवों और घटनाओं को एक अप्रकाशित (unpublished) संस्मरण / memoir में दर्ज किया

भारत-चीन सीमा पर 2020 में जो तनाव पैदा हुआ, वह सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं था, बल्कि राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर एक बड़ी परीक्षा थी। उस समय भारतीय सेना की कमान जनरल एम.एम. नरवणे के हाथों में थी।

अपने अप्रकाशित संस्मरण में जनरल नरवणे ने उन घटनाओं का जिक्र किया है जो आम जनता तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाईं। उनके अनुसार, जमीन पर हालात जितने गंभीर थे, उतनी स्पष्टता देश के सामने नहीं रखी गई। कई निर्णय ऐसे थे जिन्हें सैन्य दृष्टि से देखा गया, लेकिन उन्हें राजनीतिक तरीके से प्रस्तुत किया गया।

गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के संबंध अत्यधिक तनावपूर्ण हो गए थे। उस समय सेना को बेहद कम समय में ऊँचाई वाले कठिन इलाकों में भारी संख्या में सैनिक, हथियार और संसाधन पहुंचाने पड़े। यह एक असाधारण सैन्य चुनौती थी।

नरवणे के अनुसार, इस पूरे संकट के दौरान सरकार की सार्वजनिक बयानबाजी और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच अंतर था। सैनिक स्तर पर हालात बहुत संवेदनशील थे, लेकिन देश के सामने एक नियंत्रित और संतुलित तस्वीर पेश की गई।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सेना को कई बार राजनीतिक फैसलों के अनुरूप अपनी रणनीति को ढालना पड़ा, जबकि जमीनी हकीकत अलग थी। यह संस्मरण दिखाता है कि सीमा पर संघर्ष केवल सैनिकों की लड़ाई नहीं होता, बल्कि उसमें राजनीति, कूटनीति और छवि प्रबंधन भी शामिल होता है।

यह खुलासा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार है जब उस समय के सेना प्रमुख ने अंदरूनी हालात और फैसलों के पीछे की सच्चाई को शब्दों में ढाला है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि गलवान संकट केवल एक सीमा विवाद नहीं था, बल्कि सरकार, सेना और कूटनीति के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा थी।


जनरल नरवणे का यह संस्मरण हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में आम जनता तक पहुंचने वाली जानकारी और वास्तविक घटनाओं के बीच कितना अंतर हो सकता है। यह केवल एक सैनिक अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की सच्चाई का दस्तावेज है, जब भारत-चीन संबंध एक नाजुक मोड़ पर खड़े थे।

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